जैसा कि बताया जाता है मांसाहार से मानव के व्यवहार में परिवर्तन होता है आहार के विषय मे महर्षि चरक जी का एक दृष्टांत बहुत ही सुंदर है कि एक बार उन्होंने अपने शिष्यों से पूछा कौन रोगी नहीं अर्थात स्वस्थ कौन है? महर्षि के प्रबुद्ध शिष्य वाग्भट्ट ने उत्तर दिया । हितकारी भोजन करने वाला, उचित मात्रा में भोजन करने वाला एवं ऋतु के अनुकूल भोजन करने वाला व्यक्ति स्वस्थ है। अपनी प्रकृति (वात, पित्त, कफ) को जानकर उसके अनुसार भोजन लें। आहार से मनुष्य का स्वभाव और प्रकृति तय होती है। शाकाहार से स्वभाव शांत रहता है। मांसाहार से मनुष्य बोहोत ही हिंसक प्रवृति का हो जाता है । यदि वात प्रकृति है शरीर मे वायु विकार होते हैं तो चावल आदि वायुकारक है एवं खट्टे भोजनों का त्याग कर देना चाहिए एवं छोटी पिप्पली, सौंठ, अदरक आदि का प्रयोग करते रहना चाहिए। पित्त प्रकृति वाले को गर्म, तले हुए, पदार्थ नहीं लेने चाहिए एवं घी , खीरा, ककड़ी आदि अच्छा भोजन लाभदायक होता है। कफ प्रकृति वाले को ठंडी चीजें चावल, दही, छाछ आदि का सेवन अति मात्रा में नही करना चाहिए । मौसम के अनुसार खाद्य सामग्रियों का मेल करके सेवन करने से कोई भी बीमारी नजदीक नही आती है व व्यक्ति स्वस्थ रहता है । भोजन का समय निश्चित होना चाहिए। असमय किया हुआ भोजन अपचन करके रोग उत्पन्न करता है।
अब हम आपको एक साधारण से नियम बताते है जिससे ये समझना आसान होगा कि हमे करना क्या है हम कैसे सेहतमंद रह सकते है और बीमारियों से दूर रह सकते है।।
1) प्रातः काल आठ बजे से नौ बजे के बीच मे हल्का पेय व फलादि लेना सेहत के लिए अच्छा होगा।
2) प्रातः काल मे अन्न का प्रयोग जितना कम करेंगे उतना शरीर के लिए उत्तम होगा।
3) पचास वर्ष से अधिक उम्र के व्यक्ति को सुबह अन्न का सेवन नही करना , लाभदायक है।
4) मध्यान में ग्यारह से बारह बजे भोजन लेना उत्तम है।
5) बारह से एक बजे का समय मध्यम, उसके बाद उत्तरोत्तम निकृष्ट माना जाता है। जिसमे भोजन का सेवन नही करना चाहिए।
6) सायंकाल सात से आठ का समय उत्तम, आठ से नौ का समय मध्यम और नौ के बाद उत्तरोत्तम निकृष्ट समय होता है।
7) भोजन करते समय बात चीत नही करनी चाहिए क्योकि भोजन करते वक्त आप भोजन को अच्छी तरह से चबा नही पाएंगे और अधिक भी नही खा पाएंगे।
8) भोजन को चबा-चबा कर करना चाहिए।
9) एक कौर को बत्तीस या कम से कम बीस बार चबाना ही चाहिए।
10) चबाकर भोजन करने से, हिंसा भाव भी कम होती है।
11) संस्कृत में एक श्लोक आता है। जिसका तात्पर्य है- 'जो प्रातःकाल उठकर जलपान करता है, रात्रि को भोजन के बाद दूध पीता है तथा मध्यम में भोजन के बाद छाछ पिता है उसे वैद्य की आवश्यकता नहीं होती।
अब बात करते है जो सेवन करने योग्य नही है भारतीय संस्कृति व सनातन धर्म के अनुसार-
हमे मांस व अंडे का सेवन नही करना चाहिए क्योंकि भगवान ने हमें शाकाहारी बनाया है। जब हम रोटी खाकर जी सकते है, जिसमें हिंसा नहीं, तो किसी प्राणी की हत्या करके, उसके प्रिय जीवन को समाप्त करके आपको भी जीने की आवश्यकता नही है? इस जीवन को नष्ट कर देना चाहिए क्योंकि वो मौत के ही बराबर है।
मांस खाने से दया, करुणा, सहानुभूति, प्रेम एवं श्रद्धाभक्ति आदि मानवीय गुणों का अंत हो जाता है समाप्त हो जाता है। मावन - दानव प्रकृति का हो जाता है उसकी सोच घृणित, हिंसक और अत्याचारी हो जाती है उसके विचार दूषित हो जाते जाते है।

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